Kabir Ke Dohe कबीर जी के दोहे

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Kabir ke dohe
Kabir ke dohe

Kabir Ke Dohe यह अनमोल ज्ञान है।

Kabir Ke Dohe कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से आज से लगभग 600 वर्ष पूर्व ही ज्ञान दे दिया था।
ऐसा ज्ञान जो हर युग में हर संकट में हर परिस्थिति में मानो आज का ही दिया हुआ हो।
बस उसको समझने की जरूरत है।

हम समझते भी हैं और समझना भी चाहते हैं। और समझते भी हैं।
किन्तु फिर भी अनजान बने हुए हैं।
ऐसा भी नहीं है कि kabir ke dohe के रूप में कबीर ने जो ज्ञान दिया है वह सिर्फ धार्मिक हो नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है।

Sant Kabir
Sant Kabir

जैसे कि मैंने पहले भी बोला है कि हर परिस्थिति में यह ज्ञान उचित एवं सटीक है।
चाहें आप राजा बनना चाहते हों या फिर वैज्ञानिक आप रंक हों या फ़कीर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
क्योंकि यह अनमोल ज्ञान हर किसी के लिए है kabir ke dohe जिन्हें कहते हैं।

आज उनके 10 दोहे मैं नीचे अर्थ सहित लिख रहा हूं।
जिनसे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं और अपने निजी जीवन में उतार सकते हैं।
और अपने कार्य क्षेत्र में kabir ke dohe के माध्यम से सफल बन सकते हैं।

फिर चाहें आप एक इंजीनियर हों एक्टर हों राइटर हों अथवा इस संसार का कोई भी कार्य करते हों।
आपके लिए kabir ke dohe सटीक बैठेंगे यहीं तो इनकी महत्ता है।
और यही इनको अनमोल होने उपाधि दिलाती है।

इसलिए ही कुछ लोग इनको भगवान तो कुछ संत तो कुछ महान व्यक्तित्व कहते हैं।

Kabir Ke Dohe

 

१ दोहा – बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

 

अर्थकबीर जी कहते हैं जब मैं इस दुनिया में बुरा ढूंढ़ने ने निकला तो मुझे कोई भी बुरा नहीं मिला।
जब मैंने अपने में ही बुराईयां ढूंढ़ी तो मुझे मुझसे बुरा कोई नहीं मिला।

इस संसार में सब से पहले खुद में बुराईयां देखो फिर आपको कोई और बुरा नहीं दिखेगा।

 

२. दोहा – कबीर कूता राम का, मुटिया मेरा नाऊ।
गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊं।।

अर्थकबीर राम के कुत्ते की तरह है। जैसे कुत्ता मालिक के कहने पर कुछ भी करता है। वैसे ही कबीर भी राम के कहने पर ही सब कुछ करता है।
कबीर वहीं जाता है जहां उसे राम ले जाता है। कबीर ने राम की जंजीर को अपने गले में बांधा है।
जो कबीर के पास राम नाम का मोती है बस वही अनमोल है।

Sant Kabir
Sant Kabir

३. दोहा – माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।।

अर्थकबीर जी इस दोहे में संदेश दें रहे हैं। कि इस संसार में ना माया मरती है ना मन करता है। मरता है तो शरीर वो ना जाने कितनी बार मर चुका है।
किन्तु फिर भी आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती है। कबीर जी ने यह वाक्य बार बार बोला है।

 

४. दोहा – कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी।
एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पांव पसारी।।

अर्थकबीर जी का कथन है कि अज्ञान की इस नींद से जाग जाओ। और ज्ञान को प्राप्त करो राम का नाम जपो। अज्ञानी नींद में कब तक सोते रहोगे ?
जाग सकते हो तो जागो फिर एक दिन गहरी नींद में सो जाओगे। अभी समय है राम का नाम जपलो।
फिर जब गहरी नींद में सो जाओगे तो कुछ नहीं कर पाओगे।

 

५. दोहा – रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।।

अर्थकबीर जी समझा रहे हैं कि दिन भर खाते रहे और रातों को सोते रहे। सारा समय सोने और खाने में ही नष्ट कर दिया।
यह मानव जन्म हीरे की तरह अनमोल है। जिसे तुम बर्बाद कर रहे हो। जब तुमने जीवन के एक भी क्षण को सार्थक नहीं किया। तो फिर उस जन्म का मूल्य ही कहां बचा ? मात्र एक कौड़ी…

 

६. दोहा – कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूं सो पहला दिन।।

अर्थकबीर जी कहते हैं कि कहते सुनते यह सब दिन बीत गये हैं। फिर भी यह मन सुलझ नहीं पाया है। यह मन तो बस उलझ कर रह गया है।
आज भी यह मन वैसा ही है जैसा पहले दिन था। इस मन को आज भी कोई होश नहीं है कल भी कोई होश नहीं था।

 

७. दोहा – यह तन काचा कुम्भ है, लिया फिरे था साथ।
ढबका लागा फूटिगा, कछु न आया हाथ।।

अर्थ – तू इस शरीर को लेकर घूमता फिरता रहा। यह शरीर तो कच्चे घड़े की तरह था जिसे तू साथ में लेकर घूमता रहा।
ज़िंदगी भर लेकर घूमने के बाद भी कुछ हाथ नहीं आया।

जरा सी चोट लगी और यह घड़ा फूट गया। रह गया खाली हाथ….

Kabir Ji
Kabir Ji

८. दोहा – कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई।
अंतरि भीगी आतमा, हरि भई बनराई।।

अर्थ – इस दोहे में कबीर जी कह रहे हैं कि प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर वर्षा कर गया। जिस वर्षा में मेरी अंतर आत्मा तक भीग गई।
आस पास भी सब कुछ भीग गया सब हरा भरा हो गया। मैं भी खुशहाल हो गया।

आत्मा भी निहाल ही गई यही तो प्रेम का अपूर्व प्रभाव है। आप सब भी इसी प्रेम में भीग जाओ। और इसी प्रेम जिओ।

 

९. दोहा – कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास।
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूंद की आस।।

अर्थकबीर जी ने इस दोहे के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। कि जिस प्रकार समुन्द्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है।
स्वाति नक्षत्र की एक बूंद की आशा लिए हुए। समुन्द्र के अपार पानी को तिनके की बराबर मानती है।

यानि कि हमारे मन में जो ललक है जिसे बस पाने की लगन है। उसके बिना सारा संसार बेकार है।

 

१०. दोहा – बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत।
आधा परधा ऊबरै, चेति सकै तो चेत।।

अर्थकबीर जी समझा रहे हैं कि बिना रखवाली के जैसे चिड़ियों ने खेत खा लिया।

वैसे ही मनुष्य भी अपना जीवन गंवा रहा है। कुछ खेत अब भी बचा हुआ है कुछ बचा सकते हो तो बचा लो।
यदि अभी भी सावधान नहीं हुए तो कुछ नहीं बचेगा।

नुकसान हो चुका है हो रहा है यदि अभी भी हम सावधान हो जाएं तो कुछ नुकसान से बच सकते हैं।
इसलिए हमे अभी भी सावधान हो जाना चाहिए। हम इस अनमोल प्रकृति को बचा सकते हैं।
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है अभी बहुत कुछ बाकी है।

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