जेंद अवेस्ता पारसियों का धर्मग्रंथ है

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जेंद अवेस्ता
जेंद अवेस्ता

जेंद अवेस्ता पढ़ने में ऋग्वेद का ही भाग लगता है।

 

‘जेंद अवेस्ता’ पारसियों का धर्म ग्रंथ पढ़ने में ऋग्वेद का ही भाग लगता है।
भाषाओं में जरूर थोड़ा अंतर मिलता है।

जो ऋग्वैदिक संस्कृत की ही एक पुरातन शाखा अवेस्ता भाषा में लिखा गया है।

यही कारण है कि ऋग्वेद और अवेस्ता में बहुत से शब्दों की समानता है।

ऋग्वेदिक काल में ईरान को पारस्य देश कहा जाता था। अफगानिस्तान के इलाके से आर्यों की एक शाखा ने ईरान का रुख किया।

ईरान को प्राचीन काल में पारस्य देश कहा जाता था। इसके निवासी अत्रि कुल के माने जाते हैं।

ऋग्वेद के पंचम मंडल के दृष्टा महर्षि अत्रि उनकी पत्नी अनुसुइया जिनका आश्रम चित्रकूट में था।

मान्यता है कि अत्रि दम्पति के ही वंशज ही सिंधु पार करके पारस ( आज के ईरान ) चले गए थे।

zoroastrianism
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पारसी अग्नि पूजा क्यूँ करते हैं

 

जहाँ उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। यही कारण है कि अग्निपूजा की जाती है।

जरथुस्त्र ने इस धर्म को एक व्यवस्था दी तो इस धर्म का नाम ‘जरथुस्त्र’ या ‘जोराबियन धर्म’ पड़ गया था।

हिन्दू धर्म मे भी अग्नि का बहुत महत्व है अतः पूजनीय है वहीं पारसी भी अग्नि पूजा करते हैं।

पारसी धर्म की लड़कियां किसी अन्य धर्म मे शादी करलें तो उनको और उनके बच्चों को पारसियों के मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत नहीं होती।

पारसियों का योगदान

स्मृति ईरानी
स्मृति ईरानी

पारसी धर्म लोग भारत मे इस तरह से घुल मिल गए ।

और भारत को उन्नति की ओर लेजाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चाहें वो अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए हो या व्यापार और उद्योगीकरण हो भारत में टाटा, गोदरेज, बोमन ईरानी, अरुणा ईरानी, स्मृति ईरानी हो या सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ जो भारतीय सेना के अध्यक्ष थे।

जिनके नेतृत्व में भारत ने सन् 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त की थी जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ था।

हर क्षेत्र में पारसियों का बहुत योगदान रहा है। यही कारण है कि भारतीय लोग इनको बहुत प्रेम करते हैं।

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